Wednesday, 30 October 2013

आम आदमी ..................कविता (अन्नपूर्णा बाजपेई )



घुट घुट के जीता मरता है ये आम आदमी ,
अब दिन रात तड़पता है ये आम आदमी ।

कब तलक यूं ही मरेगा ये आम आदमी ,
एक दिन तो जी उठेगा ये आम आदमी ।

दर्दे हुकूमत अब जरा मनमोहन से पूछिये ,
लगता है गले आ पड़ा है आम आदमी ।

तरकस मे तीर है न तलवार म्यान मे ,
अब अनशन किए पड़ा है आम आदमी ।

लहरातीं खेतियाँ बिल्डरों को बेच दीं ,
अब खाली कब्र ढूँढता है आम आदमी ।

सरकार के रहमो करम पे जी रहे है लोग ,
कहते हैं सिर फिरा हुआ है आम आदमी ।

हुक्काम सभी चूस रहे खून बेबसी का ,
लाचार दर्द सह रहा है अब आम आदमी । 

एक तरफ पंजा हक़ जमा रहा दुजी ओर कमल खिल रहा ,
उठल्लुओं की कौन कहे  पिस रहा है केवल आम आदमी ।

रईसों का भोजन हुआ ये व्यंजनों मे शामिल प्याज भी ,
अब इस नामुराद प्याज को भी तरस रहा है आम आदमी ।

मौलिक एवं अप्रकाशित




12 comments:

  1. एक तरफ पंजा हक़ जमा रहा दुजी ओर कमल खिल रहा ,
    उठल्लुओं की कौन कहे पिस रहा है केवल आम आदमी ।
    बुलेट प्रूफ पोडियम से नेता देंगे भाषण, राशन, किरासन ,
    जो जायेगा सुनने, देखने, विष्फोट से उड़ेगा, यही आम आदमी!

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    1. सही कहा अपने आ0 जवाहर लाल जी ।

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बृहस्पतिवार (31-10-2013) "सबसे नशीला जाम है" चर्चा - 1415 में "मयंक का कोना" पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. आपका धन्यवाद ।

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  3. रईसों का भोजन हुआ ये व्यंजनों मे शामिल प्याज भी ,
    अब इस नामुराद प्याज को भी तरस रहा है आम आदमी ।
    वहुत सुन्दर समसामयिक रचना
    नई पोस्ट हम-तुम अकेले

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    1. धन्यवाद आपका आ0 कालीपद जी ।

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    1. आपका हार्दिक आभार ।

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  6. aapke kalam ki yha bahut sunder rachna hai

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  7. आपका सबका हार्दिक आभार ।

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