Thursday, 18 July 2013

सामाजिक कुरीतियाँ एक अभिशाप

समाज मात्र एक शब्द नहीं अपितु यह शब्द  अपने आप मे बड़ी गहराई लिए हुए है । व्यक्ति जुड़ कर रिश्ते बनते है रिश्तों से परिवार बनता है, परिवार जुडते जुडते एक समाज की संरचना करते है । इसलिए समाज हमारा ही परिवार है ये अलग नहीं है । व्यक्तियों के साथ साथ उनकी अच्छी बुरी सोच भी एक दूसरे से जुड़ जाती है । संवेदनाओं और इंसान का आपस मे  बड़ा गहरा रिश्ता है । किन्तु जहां संवेदनाए समाप्त हो जाती है वहाँ कुरीतियाँ जन्म लेती है । आज समाज मे हम अपने चारों ओर देखते है तो यही पाते है की सारा समाज संवेदना हीन हो चुका है । संवेदनाहीन समाज मे अनेकों कुरीतियाँ फैल रही है । जिनकी वजह से आज समाज का विकृत रूप सामने आ रहा है।  समाज मे फैली तमाम बुराइयाँ जैसे स्त्री शोषण , कन्या भ्रूण हत्या , भ्रष्टाचार , दहेज, बाल श्रम, छुआछूत, बाल विवाह  इत्यादि जिनको दूर करने के लिए हम सभी काफी समय से प्रयास रत है  कुछ कुरीतियों पर लगाम लगाई जा चुकी है जैसे सती प्रथा , बाल विवाह, किन्तु बाल विवाह की कुप्रथा आज भी हमे राजस्थान , मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों मे देखने सुनने को मिल ही जाती है।

स्त्री शोषण :- वैदिक काल मे जिस स्त्री को देवी की तरह माना जाता था आज उसका घोर अपमान अपनी जड़े जमा रहा है । उसको केवल भोग विलास की वस्तु समझने वालों तथा स्त्री को हेय दृष्टि से देखने वालों की बीमार मानसिकता कहें या पुरुष वर्चस्व की प्रधानता कहें , जो भी हो परंतु अधिकांश वर्ग स्त्री को उसका अधिकार नहीं दे पाता है और उसे सामाजिक न्याय से वंचित रखा जाता है । कहीं कहीं हम देखते है की स्त्री और पुरुष दोनों ही कमाऊ होते हैं पर स्त्री को घर और बाहर दोनों की जिम्मेदारियों का भलीभाँति निर्वहन करना पड़ता है अन्यथा घर मे व आफिस दोनों जगह उसका मानसिक शोषण होता है क्योंकि वह एक नारी है। आज अधिकांश स्त्रियाँ काम करती हैं घर और रोजगार दोनों को कुशलता पूर्वक संभालतीं हैं ।
आज हम यह भी देख रहे है कि कुछ कुत्सित मानसिकता वाले लोगो ने बलात्कार सरीखा सबसे घिनौना तरीका स्त्री शोषित करने के लिए अपनाया है । पीड़िता स्त्री या बालिका का जीवन अंधकारमय हो जाता है कई तो लोक लाज के डर से अपना मुंह नहीं खोल पाती और कई अपना जीवन ही समाप्त कर लेतीं हैं साथ ही ऐसा भी देखने मे आता है कि अपराधी पीड़िता का जीवन ही छीन लेता है । कुछ ही पीड़िताएं इस दुःख से बाहर निकल पाती हैं और अपराधी के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत करतीं हैं।
बलात्कार एक संज्ञेय अपराध है और पुलिस अधिकारी बिना वारंट के भी अभियुक्त को हिरासत मे ले सकता है । बलात्कार का आरोप , सेशन कोर्ट द्वारा पूर्णतया विचारणीय होता है । इसकी सामान्य सजा कम से कम 7 से 10 वर्षों तक कारावास और अधिक से अधिक आजीवन कारावास औए जुर्माना है । अभी हाल ही मे इन मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का भी गठन हुआ है ताकि पीड़िता को शीघ्र न्याय और अपराधी को सजा सुनाई जा सके । भारतीय दंड संहिता की धारा 511 के अंतर्गत बलात्कार का प्रयास करना भी अपराध है ।      

कन्या भ्रूण हत्या एवं शिशु बालिका हत्या :- आज की सबसे ज्वलंत समस्या समाज मे लड़कियों के प्रति बढ़ती हिंसा ही है। ये जानते हुए कि स्त्री  के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती, ये कार्य निष्पादित किए जा रहे है । घर का चिराग चाहने वालों ने आज तक बेटी को नहीं अपनाया है , क्या ये सत्य नहीं है कि बेटी बिना जीवन कैसे संभव है । आपकी बेटी किसी के घर के चिराग को जन्म देगी ठीक उसी तरह किसी और की बेटी जो आपके घर आई है वो आपके घर का चिराग लाएगी । और ये सिलसिला क्रमानुसार चलता रहेगा । आज सबसे ज्यादा आवश्यकता है कि अपने मस्तिष्क के पट खोले जाएँ । बेटियों को भी जन्म ले कर जीने दिया जाए ।

भ्रष्टाचार :-  समाज मे व्याप्त ये चेतनाशून्य कर देने वाली महामारी है । जिस भी क्षेत्र मे हम देखें तो पाते हैं कि छोटे स्तर से लेकर ऊपर तक संवेदना हीन कर्त्ताओं की फौज है । किसी को किसी की भावनाओं से कोई सरोकार नहीं है । ऐसे मे ये कहना गलत न होगा कि भ्रष्टाचार बुरी तरह अपनी जड़े जमा चुका है जिसका उन्मूलन असंभव है । इसी भ्रष्टाचार के मुद्दे को लेकर अन्ना हज़ारे जी का आंदोलन काफी समय से चल रहा है किन्तु सफलता नहीं मिल पाई है। अभूतपूर्व प्रयासों से हर असंभव को संभव किया जा सकता है हम आशान्वित है कि एक न एक दिन भ्रष्टाचार का उन्मूलन  अवश्य हो पाएगा ।

बाल श्रम :- बच्चों की कोमल आयु और शारीरिक सामर्थ्य को ध्यान मे न रखते हुए तथा जिनकी आयु चौदह वर्ष से कम होती है, वे किसी भी ऐसे प्रक्रमों जो हानिप्रद है और असुरक्षित है, मे कार्य करते है तो यह बाल श्रम की श्रेणी मे आता है। बाल श्रम ( प्रतिनिषेध एवं विनियमन )अधिनियम 1986 के अंतर्गत बनये कानून के अनुसार चौदह वर्ष की आयु से कम के बच्चों से काम करवाना दंडनीय अपराध है । ये जानते हुए कि ये अपराध है कई प्रतिष्ठानों मे , मिलों मे , ईंट गारा ढोने , चमड़ा साफ करने , होटलों मे अक्सर छोटे बच्चे काम करते हुये मिल ही जाते है क्योकि इनसे काम लेकर कम पैसे मे टरकाया जा सकता है ।

बाल विवाह :-   भारत के कई राज्यों जैसे राजस्थान , मध्य प्रदेश , बिहार मे रीति रिवाजों के नाम पर छोटे - छोटे  लड़के, लड़कियों का विवाह करा दिया जाता है । इसका मुख्य कारण  जोरदार सामाजिक अनुमोदन तथा सामाजिक विधान की तरफ कम ध्यान देना है । जिससे बच्चों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है, मस्तिष्क पूरी तरह विकसित नहीं होता और वे भोग विलास की ओर बढ़ जाते है जिससे  मातृ कुपोषण और शिशु कुपोषण की स्थितियाँ सामने आती हैं, मातृ एवं शिशु मृत्यु दर मे भी इजाफा होता है ।
इनको रोकने के लिए सरकार की ओर से कदम उठाए गए,  बाल विवाह अवरोध अधिनियम बनाया गया जिसके अंतर्गत 1949 मे आयु सीमा लड़कों के लिए 18 वर्ष एवं लड़कियों के लिए 15 वर्ष थी । स्वास्थ्य की दृष्टि से  मातृ एवं शिशु कल्याण के लिए कानून मे संशोधन किया गया । जो की 1 अक्तूबर 1977 मे पारित हुआ उसकी आयु सीमा निर्धारित की गई – लड़के के लिए 21 वर्ष एवं लड़की के लिए 18 वर्ष । इससे कम की आयु के बच्चों का विवाह बाल विवाह की श्रेणी के अंतर्गत रक्खा जाएगा और अधिनियम के अंतर्गत संबन्धित व्यक्तियों पर कानूनी कार्यवाही की जायगी ।    

दहेज प्रथा :- आज सबसे ज्वलंत समस्या दहेज ही है, जिसकी वजह से लड़कियों का जीवन नरकीय हो जाता है । कितना भी पढ़ी लिखी लड़की हो , कितनी ही सुंदर क्यों न हो, सुशील संस्कारी हो , ससुराल मे उसकी कीमत उसके पिता के पैसे तय करते है। प्राचीन काल मे विवाह के समय बेटी को उसके पिता या उसके सगे संबंधियों से जो भी सामान उपहार स्वरूप मिलता था उसमे उनकी खुशी व प्यार भरा आशीर्वाद हुआ करता था । आज उसके मायने ही बदल गए है इस प्रथा ने दानवीय रूप धरण कर लिया , उपहारों को आवश्यक और अपना अधिकार समझा जाने लगा और साथ मे मांग भी रखी जाने लगी, मांग पूरी न होने पर बेटी को ससुराल मे सताया जाने लगा कई मामलों मे लड़कियों को जिंदा तक जला दिया गया । फलस्वरूप बेटियों के योग्य होने पर भी दहेज के अभाव मे अविवाहित रहना पड जाता है। अधिकांश धर्मों मे विवाह तो स्त्री और पुरुष का पवित्र बंधन माना जाता है। विवाह का सार प्रेम और एक दूसरे के लिए समर्पण है । किन्तु दहेज की दोष पूर्ण प्रणाली के कारण स्त्री का दर्जा निम्न हो जाता है और जिससे हमारे संविधान मे लिखित समानता के अधिकार का उल्लंघन होता है ।           
सरकार ने समय समय पर नए कानून बना कर इस बुराई को नियंत्रित करने का प्रयास किया है । दहेज लेने या देने की प्रथा पर रोक लगाने के लिए 1961 मे दहेज प्रतिषेध अधिनियम पारित किया गया । इसके बाद दहेज के कारण होने वाली मौतों ने इस अधिनियम को अप्रभावी पाया । 1983 मे दंड प्रक्रिया संहिता का संशोधन किया गया जिसमे दहेज की मांग करने वाले पति और उसके सगे संबंधियों को महिला के प्रति क्रूरता दिखाने और यातना देने के लिए सजा का प्रावधान था । 1984 मे  दहेज प्रतिषेध अधिनियम-1961, को दहेज लेने या देने को संज्ञेय अपराध बनाने के लिए संशोधित किया गया । 1986 मे एक अन्य संशोधन हुआ जिसमे दहेज के कारण होने वाली मौत को परिभाषित किया और ऐसी महिला के शव का पोस्टमार्टम करना अनिवार्य बनाया जिसकी मृत्यु विवाह के सात वर्षों के भीतर संदिग्ध परिस्तिथियों मे मृत्यु हुई हो या उसने आत्महत्या की हो । तब से अब तक इस कानून के अंतर्गत दहेज उत्पीड़न की समस्याओं की सुनवाई होती है और अभियुक्त को दंडित किया जाता है । दहेज का अपराध सिद्ध हो जाने पर एक वर्ष से लेकर दस वर्षों तक की सजा का प्रावधान भी है । इस कानून के बनने के बाद दहेज के कारण होने वाली मौतों पर काफी हद तक लगाम लगाई जा सकी है । किन्तु दहेज की कुप्रथा को समाप्त नहीं किया जा सका है । इसके लिए जन मानस को जागने की अत्यंत आवश्यकता है ।

समाज फैली इन तमाम कुरीतियों ने विश्व पटल पर देश की  छवि को खराब किया है। ये कुरीतियाँ या कुप्रथायेँ देश के लिए अभिशाप हैं जिनको अति शीघ्र दूर करने का सतत प्रयास होना चाहिए ।



9 comments:

  1. बिलकुल सही कह तुमने अन्नु मगर इस सभी कुरीतियों को केवल एक व्यक्ति दूर नहीं कर सकता। इसमें जनमानस से लेकर सरकार प्रशासन कानून जनता सभी की जरूरत है क्यूंकि एक सभ्य और सुरक्षित समाज बनाने में हर एक की अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका है। मगर विडम्बना यही है कि आज की तारीक में एक सभ्य और सुरक्षित समाज के यह सभी आधार स्तंभ बिखरे हुए हैं। जिसके कारण झूठों का बोलबाला और सच्चों का मुंह काला है।

    ReplyDelete
    Replies
    1. तुम्हारी बात एकदम सही है पल्लवी लेकिन जिस तरह बूंद बूंद कर गागर भरती है ठीक उसी तरह थोड़ा थोड़ा कर समाज से कुरीतियाँ भी दूर हो जाएंगी भले ही पूरी तरह न सही लेकिन कुछ हद तक तो अवश्य की जा सकेगी ।

      Delete
  2. Annapurnaji,
    You are right.but to bring changes in the society we all have to join hands.
    Vinnie

    ReplyDelete
  3. Annapurnaji,
    You are right what you have written but we all have to join hands to change the society.
    Vinnie

    ReplyDelete
  4. bilkul sahi kaha apne....badlav ki bahut jarurat hai....par agar sab mil kar karein tabhi ho sakta hai kuch

    ReplyDelete
  5. समाज को बदलने के लिए सभी को एकजुट होना चाहिए

    ReplyDelete
  6. Sabhi ki ekta se samaaj badal sakta hai.ye sab purani prathaye h jinhe aaj bhi mana jata h . Agar ham sab mil ke undhavishvas ko apne man se hata denge tabhi samajh aage baad sakta hai.

    ReplyDelete
  7. सत्य बात....बेहतरीन लेख

    ReplyDelete
  8. सत्य बात....बेहतरीन लेख

    ReplyDelete