Wednesday, 4 April 2018

बेटियाँ



बेटियाँ घर आँगन की रौनक 

जिस प्रकार एक उपवन बिना चिड़ियों की चहचहाहट के अधूरा और सूना-सूना लगता है उसी प्रकार बेटियों के बिना घर का उपवन, आँगन भी अधूरा और सूना लगता है। इसका दर्द वही समझ पाता है जिस घर में बेटी नहीं होती। सोच कर देखिये ।
इतिहास उठा कर देखे तो हम पाएंगे कि तब से आज तक वक़्त ने स्त्रियॉं से खुद के होने के सबूत मांगे हैं । लेकिन यह भी सत्य है कि उसने स्त्रियॉं को सफलता के झंडे गाड़ते देखा है| हमारे देश की कई बेटियों ने इतिहास रचा है |देश की बेटियाँ हर क्षेत्र में देश का गौरव बन कर हम सब के लिए प्रेरणादायक रही हैं |  देवी अहिल्या, सीता , गार्गी , लक्ष्मी बाई, कल्पना चावला, इंदिरा गांधी, लता मंगेश्कर दीदी एवं अनेकानेक महिलाएं एवं बेटियाँ जिन्होने प्रत्येक क्षेत्र मे अपनी कुशलता का परिचय दिया है । घर परिवार को संभालना हो या बाहर निकल कर किसी भी क्षेत्र में , स्त्री ने खुद को बेहतर साबित किया है । 
आज तकरीबन सभी नेताओं को कहते सुना जा सकता है कि जब बेटियाँ सशक्त होंगी, तभी प्रदेश सशक्त होगा और आगे बढ़ेगा। सरकारें बेटियों की रक्षा करने, उन्हें आगे बढ़ने में सहयोग देने के लिये तैयार है। बेटियों की तरक्की में किसी भी प्रकार की बाधा नहीं आने दी जायेगी। बेटियां बड़ी सोच रखेँ, आत्मविश्वास रखें, आगे बढ़ने का रोडमैप बनायें और पूरी एकाग्रता तथा दृढ़ निश्चय के साथ सफलता हासिल करें। देश का गौरव बढ़ायें और प्रदेश की शान बन जायें। बेटियाँ कमजोर नहीं होतीं, इसलिए हमेशा सकारात्मक सोचें। नकारात्मक विचारों से दूर रहें। अहंकार से दूर रहें, उत्साह से भरपूर रहें। कठिन परिश्रम करें और हर परिस्थिति में निरपेक्ष रहें।बड़ा लक्ष्य तय करें और आत्मविश्वास के साथ कठिन परिश्रम करते हुए सफलता हासिल करें, तब जाकर कहीं सरकार उनका साथ देगी । आज जब बेटियाँ खुद अपने कंधों को मजबूत बना रहीं है और लड़ाकू विमान तक उड़ाने लगीं है । क्या तब भी स्त्री को यह साबित करने की जरूरत है कि वह किसी से कम नहीं ?  कम से कम ऐसा मैं तो नहीं समझती । बल्कि उसने साबित कर दिखाया है कि वह किसी से कम नहीं है । लोग माने तो, न माने तो भी स्त्री ने मानने के लिए मजबूर कर दिया है ।
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना आज भले ही सरकार भी चला रही है लेकिन इस बाबत व्यक्तिगत प्रयास भी कम महत्त्व पूर्ण नहीं है। विभिन्न स्वयं सेवी संस्थाएँ एवं निजी प्रयासों के बेहतर परिणाम हमारे सामने है । इसी कड़ी में एच. एन. मीणा जो की भारतीय राजस्व सेवा के 2004 बैच के अधिकारी है और उनकी पत्नी डॉ हेमलता मीणा पिछले 8 वर्षों से कन्या भ्रूण हत्या व् महिलाओं के अधिकारों के लिए देश भर में आंदोलन चला रहे हैं ।  हिंदुस्तान की आजादी के बाद की पहली जनगणना जो  सन्  1951 में हुई ,के आंकड़ो के अनुसार प्रति हज़ार पुरुषो पर 946 महिलाएं थी उस समय ,लेकिन अफ़सोस आजादी के दशको बाद भी यह आंकड़ा प्रति हज़ार पुरुषो पर 940 महिलाओं पर ही सिमट के रह गया है। देश में सन् 2011 की जनगणना के अनुसार 3.73 करोड़ महिलाएं कम है ,कुल देश की जनसँख्या 121 करोड़ में से। देश में 0-6 आयुवर्ग में लिंगानुपात सन् 1991 की जनगणना के आकड़ो के अनुसार 945 था जो घटकर सन् 2001 की जनगणना में 927 पर आ गया और यह सन् 2011की जनगणना के आकड़ो के अनुसार 918 पर आ गया।यह आंकड़े  देश में लिंगानुपात की विषम होती चिंताजनक स्तिथि को दर्शाते हैं। यदि हालात यही रहे तो आने वाले वर्षो में स्थिति और चिंताजनक हो सकती है। देश में स्त्री पुरुष जनसंख्या के हिसाब से भी बराबरी पर नहीं है। भारत सरकार और राज्य सरकारो ने अपने अपने स्तर पर इस स्तिथि से निपटने के लिए कई प्रकार से प्रयास किये हैं।लेकिन पिछले 20 वर्षो का देश के लिंगानुपात में महिलाओं की संख्या कम होने के कारण और उनसे निपटने के अब तक के किये गए सम्मलित प्रयासों का अध्ययन /अनुभव यह कहता है कि जब तक हम सब इस घृणित बुराई के खिलाफ खड़े नहीं होंगे इससे मुक्ति संभव प्रतीत नहीं होती और इसके लिए हमें देश भर में आंदोलन चलाने की जरूरत है। देश की सरकार, बहुत सारे सरकारी गैर सरकारी संगठन और लोगो के  व्यक्तिगत प्रयास जारी है। एच एन मीणा एवं उनकी पत्नी डॉ हेमलता मीणा दोनों पति -पत्नी इस पुनीत कार्य में कई वर्षो से अपनी श्रद्धानुसार ,किसी से कोई चंदा उगाई के बिना सिर्फ अपने वेतन में से एक हिस्सा  खर्चा करके  बेटियों को बचाने की दिशा में लोगो को जागरूक करने की कोशिश कर रहे हैं। कई वर्षो में अब तक इन्होंने इस कार्यक्रम को बिना किसी से वित्तीय सहयोग  के  चलाया । जब तक  देश से यह लिंगानुपात की खाई मिट नहीं जाती उनका हर स्तर पर, सरकारी नौकरी की व्यस्तताओं के बीच भी  रविवार आदि छुट्टी के दिनों में भी बेटियों को बचाने के लिए प्रयास जारी रहेगा । यह अंतर तब तक नहीं पाटा जा सकता है जब तक की हमारी स्त्रियों के प्रति सोच में आमूलचूल  परिवर्तन नहीं आ जाए। इसके लिए हमें एक ऐसे आंदोलन की जरूरत है जो लोगो की सोच में एक हद तक ऐसा परिवर्तन ला पाये जिसके आईने में हमें लड़का लड़की में भेद नज़र नहीं आये । अनेक प्रयास जारी है कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए ।
कुछ कुंठित मानसिकता वाले लोगों के चलते स्त्री का सम्मान प्रभावित हुआ है। स्त्री जन्म दर प्रभावित हुयी है । इसमें सरकार का हस्तक्षेप होना अत्यंत आवश्यक है । जिससे काफी हद तक समस्या का समाधान किया जा सकेगा । सरकारें कम से कम उन सबकी सहायता करे जो इस मुहिम को चला रहे है ।

प्रेषिका
अन्नपूर्णा बाजपेयी अंजु

पर्यावरण प्रहरी


पर्यावरण प्रदूषण – वायु प्रदूषण या धुंये का राक्षस
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पृथ्वी का वातावरण स्तरीय है। पृथ्वी के नजदीक लगभग 50 km ऊँचाई पर स्ट्रेटोस्फीयर है जिसमें ओजोन स्तर होता है। यह स्तर सूर्यप्रकाश की पारबैंगनी (UV) किरणों को शोषित कर उसे पृथ्वी तक पहुचने से रोकता है। आज ओजोन स्तर का तेजी से विघटन हो रहा है, वातावरण में स्थित क्लोरोफ्लोरो कार्बन (CFC) गैस के कारण ओजोन स्तर का विघटन हो रहा है।
यह सर्वप्रथम 1980 के वर्ष में नोट किया गया की ओजोन स्तर का विघटन संपूर्ण पृथ्वी के चारों ओर हो रहा है। दक्षिण ध्रुव विस्तारों में ओजोन स्तर का विघटन 40%-50% हुआ है। इस विशाल घटना को ओजोन छिद्र (ओजोन होल) कहतें है। मानव आवास वाले विस्तारों में भी ओजोन छिद्रों के फैलने की संभावना हो सकती है। परंतु यह इस बात पर आधार रखता है कि गैसों की जलवायुकीय परिस्थिति और वातावरण में तैरती अशुध्दियों के अस्तित्व पर है।
ओजोन स्तर के घटने के कारण ध्रुवीय प्रदेशों पर जमा बर्फ पिघलने लगी है तथा मानव को अनेक प्रकार के चर्म रोगों का सामना करना पड़ रहा है। ये रेफ्रिजरेटर और एयरकंडिशनर में से उपयोग में होने वाले फ़्रियोन और क्लोरोफ्लोरो कार्बन (CFC) गैस के कारण उत्पन्न हो रही समस्या है। आज हमारा वातावरण दूषित हो गया है। वाहनों तथा फैक्ट्रीयों से निकलने वाले गैसों के कारण हवा (वायु) प्रदूषित होती है।
तकनीकी वस्तुओं के प्रयोग द्वारा भी प्रदूषण फैलाया जा रहा है। वायुमंडल में सभी प्रकार की गैसों की मात्रा निश्चित है। प्रकृति में संतुलन रहने पर इन गैसों की मात्रा में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आता, परंतु किसी कारणवश यदि गैसों की मात्रा में परिवर्तन हो जाता है तो वायु प्रदूषण होता है।
अन्य प्रदूषणों की तुलना में वायु प्रदूषण का प्रभाव तत्काल दिखाई पड़ता है। वायु में यदि जहरीली गैस घुली हो तो वह तुरंत ही अपना प्रभाव दिखाती है और आस-पास के जीव-जंतुओं एवं मनुष्यों की जान ले लेती है। भोपाल गैस कांड इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। विभिन्न तकनीकों के विकास से यातायात के विभिन्न साधनों का भी विकास हुआ है।
एक ओर जहां यातायात के नवीन साधन आवागमन को सरल एवं सुगम बनाते हैं, वहीं दूसरी ओर ये पर्यावरण को प्रदूषित करने में अहम् भूमिका निभाते हैं। नगरों में प्रयोग किए जाने वाले यातायात के साधनों में पेट्रोल और डीजल ईंधन के रूप में प्रयोग किए जाते हैं। पेट्रोल और डीजल के जलने से उत्पन्न धुआं वातावरण को प्रदूषित करता है।
औद्योगिकरण के युग में उद्योगों की भरमार है। विभिन्न छोटे-बड़े उद्योगों की चिमनियों से निकलने वाले धुएं के कारण वायुमंडल में सल्फर डाइऑक्साइड और हाइड्रोजन सल्फाइड गैस मिल जाते हैं। ये गैस वर्षा के जल के साथ पृथ्वी पर पहुंचते हैं और गंधक का अम्ल बनाते हैं, जो पर्यावरण व उसके जीवधारियों के लिए हानिकारक होता है।
चमड़ा और साबुन बनाने वाले उद्योगों से निकलने वाली दुर्गंध-युक्त गैस पर्यावरण को प्रदूषित करती हैं। सीमेंट, चूना, खनिज आदि उद्योगों में अत्यधिक मात्रा में धूल उड़ती है और वायु में मिल जाती है, जिससे वायु प्रदूषित होती है। धूल मिश्रित वायु में सांस लेने से प्रायः वहां काम करने एवं रहने वालों को रक्तचाप हृदय रोग, श्वास रोग, आंखों के रोग और टी.बी. जैसे रोग होने की संभावना बढ़ जाती है।
जनसंख्या में अत्यधिक वृद्धि होने से मनुष्य के रहने का स्थान दिन-ब-दिन छोटा पड़ता जा रहा है, इसलिए मनुष्य वनों की कटाई का अपने रहने के लिए आवास का निर्माण कर रहा है। शहरों में एलपीजी तथा किरोसीन का प्रयोग खाना बनाने के लिए किया जाता है, जो एक प्रकार की दुर्गंध वायु में फैलाते हैं। कुछ लोग जलावन के लिए लकड़ी या कोयले का इस्तेमाल करते हैं, जिससे अत्यधिक धुआं निकलता है और वायु में मिल जाता है। स्थान एवं जलावन के लिए मनुष्य वनों की कटाई करते हैं। वनों की कटाई से वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्रा घट रही है और कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ रही है और वायु प्रदूषित हो रही है। मनुष्य द्वारा विभिन्न प्रकार के तकनीकी उपकरणों का सहारा लेकर विस्फोट, गोलाबारी, युद्ध आदि किए जाते हैं। बंदूक का प्रयोग एवं अत्यधिक गोलीबारी से बारूद की दुर्गंध वायुमंडल में फैलती है साथ ही दिवाली , वैवाहिक कार्यक्रमों तथा किसी भी खुशी के मौकों पर की जाने वाली आतिशबाजी से फैलने वाले प्रदूषण को नकारा नहीं जा सकता इसकी बारूदी गंध बहुत अधिक मात्रा में और कई दिनों तक वातावरण में भरी रहती है । मनुष्य अपने आराम के लिए प्लास्टिक की वस्तुओं, थैलियों इत्यादि का इस्तेमाल करते हैं और टूटने या फटने की स्थिति में उन्हें इधर-उधर फेंक देता है। सफाई कर्मचारी प्रायः सभी प्रकार के कचरे के साथ प्लास्टिक को भी जला देते हैं, जिससे वायुमंडल में दुर्गंध फैलती है तथा वायु को अशुद्ध करती है ।
तकनीक संबंधी नवीन प्रयोग करने के क्रम में कई प्रकार के विस्फोट किए जाते हैं तथा गैसों का परीक्षण किया जाता है। इस दरम्यान कई प्रकार की गैस वायुमंडल में घुलकर उसे प्रदूषित करती है। हानिकारक गैसों के अत्यधिक उत्सर्जन के कारण एसिड रेनहोती है, जो मानव के साथ-साथ अन्य जीवित प्राणियों तथा कृषि-संबंधी कार्यों के लिए घातक होती है।
दफ्तर एवं घरेलू उपयोग में लाए जाने वाले फ्रिज और एयरकंडीशनरों के कारण क्लोरो-फ्लोरो कार्बन का निर्माण होता है, जो सूर्य से निकलने वाली पराबैंगनी किरणों से हमारी त्वचा की रक्षा करने वाली ओजोन परत को क्षति पहुंचाती है। विभिन्न उत्सवों के अवसर पर अत्यधिक पटाखेबाजी से भी वायु प्रदूषित होती है जिससे कोहरे और धुंध में भी बढ़ोत्तरी होती है जिनसे दुर्घटनाएँ भी बढ़ जाती हैं कुछ लोग खुद ही खुद का जीवन बर्बाद करते है स्वयं ही धूम्र पान करके, ऐसे लोग न केवल खुद को नुकसान पहुँचते है बल्कि अपने आस-पास के लोगों को भी नुकसान पहुंचाते हैं । ऐसा करते वक्त वे किसी के विषय में भी नहीं सोचते । सिर्फ अपने सुकून और लिप्सा की संतुष्टि की अभिलाषा में ही सोचते है । अस्तु वायु प्रदूषण से पर्यावरण अत्यधिक प्रभावित होता है।
 बहुत अवश्यक है कि प्रदूषण नियंत्रण के लिए कुछ आवश्यक कदम उठाए जाएँ और शीघ्र अति शीघ्र इस पर क्रियान्वयन किया जाना चाहिए । यातायात के विभिन्न साधनों का प्रयोग जागरुकता के साथ करना होगा। अनावश्यक रूप से हॉर्न का प्रयोग नहीं करना चाहिए, जब जरूरत न हो तब इंजन को बंद करना एवं नियमित रूप से गाड़ी के साइलेंसर की जांच करवानी होगी, ताकि धुएं के अत्यधिक प्रसार को नियंत्रित किया जा सके। पटाखों तथा धूम्रपान की सामग्री को बिलकुल प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए इसके साथ ही इन वस्तुओं को प्रयोग करने वाले व्यक्तियों को दंडित करने का भी प्रावधान किया जाना चाहिए । 
उद्योगपतियों को अपने स्वार्थ को छोड़ उद्योगों की चिमनियों को ऊंचा करना होगा तथा उद्योगों को प्रदूषण नियंत्रण के नियमों का पालन करना होगा। हिंसक क्रियाकलापों पर रोक लगानी होगी। सबसे जरूरी बात यह कि लोगों को पर्यावरण संबंधी संपूर्ण जानकारी प्रदान करते हुए जागरुक बनाना होगा, तभी प्रदूषण पर नियंत्रण पाया जा सकता है।
आम लोगों को जागरुक बनाने के लिए उन्हें पर्यावरण के लाभ और उसके प्रदूषित होने पर उससे होने वाली समस्याओं की विस्तृत जानकारी देनी होगी। लोगों को जागरुक करने के लिए उनके मनोरंजन के माध्यमों द्वारा उन्हें आकर्षक रूप में जागरुक करना होगा। यह काम समस्त पृथ्वीवासियों को मिलकर करना होगा, ताकि हम अपने उस पर्यावरण को और प्रदूषित होने से बचा सके, जो हमें जीने का आधार प्रदान करता है। अत्यधिक शोर उत्पन्न करने वाले वाहनों पर रोक लगानी होगी।
प्रदूषण चाहे किसी भी प्रकार का क्यों न हो, हर हाल में मानव एवं समस्त जीवधारियों के अलावा जड़-पदार्थों को भी नुकसान ही पहुंचाती है।

प्रेषिका – अन्नपूर्णा बाजपेयी,
278, प्रभाञ्जलि, विराट नगर, जी टी रोड, अहिरवां कानपुर। पिन - 208007