Monday, 15 July 2013

कविता - प्रियतम

“प्रिय तुम ही”
सूरज की रश्मियों मे ,
चमक बन के रहते हो ।
जाग्रत करते सुप्त मन प्राण ,
सुवर्ण सा दमके  तन मन । 
चन्द्रमा की शीतलता मे ,
धवल मद्धम चाँदनी से तुम,
अमलिन मुख प्रशांत हो ।
सागर से गहरे हो तुम ,
कितना कुछ समा लेते हो ।
नूतन पथ के साथी ,
जीवन तरंगो के स्वामी ।
मन हिंडोल के बीच ,
सिर्फ तुम किलोल कालिंदी । .
सुनो प्रिय तुम ही ,
तुम ही .....प्रिय तुम ही ।

7 comments:

  1. सर्मपण और स्नेह से भरपूर रचना !

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  2. साधू-साधू
    अतिसुन्दर

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  3. आपकी रचना कल बुधवार [17-07-2013] को
    ब्लॉग प्रसारण पर
    हम पधारे आप भी पधारें |
    सादर
    सरिता भाटिया

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  4. बहुत सुन्दर

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