Thursday, 11 April 2013

समझ न पाती



वो नन्ही नन्ही सी गोल मटोल,
आंखे इधर उधर निहारती ,
कुछ तलाशती सी लगती ,
न पा सकने की स्थिति,
समझ न पाती .............

कुछ कुछ कहना चाहती ,
पर कह न पाती,
शून्य मे निहारती सी लगती,
न कह पा सकने की स्थिति,
 समझ न पाती............

खुशी से टिमटिमाती,
दुःख से टपकती,
डर से सहमती वो,
भाषा को पढ़ पाने की स्थिति,
समझ न पाती ................  

प्यार दुलार अच्छे से,
पढ़ जाती और ,
सब कुछ वह मौन आँखों से ,
कह लेने की स्थिति ,
समझ न पाती...............

वो दादी की गाय की,
छोटी सी बछिया ..................... अन्नपूर्णा बाजपेई

8 comments:

  1. bahut achi kavita hain

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  2. प्रभावशाली ,
    जारी रहें।

    शुभकामना !!!

    आर्यावर्त

    आर्यावर्त में समाचार और आलेख प्रकाशन के लिए सीधे संपादक को editor.aaryaavart@gmail.com पर मेल करें।

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    --
    नवराम्वत्सर और नवसम्वतसर-२०७० की हार्दिक शुभकामनाएँ...!

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    --
    नवरात्रों और नवसम्वतसर-२०७० की हार्दिक शुभकामनाएँ...!

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  5. बहुत ही भाव पूर्ण रचना ....

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  6. सच है जानवर भी प्यार की भाषा जानते हैं ....

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  7. sach hai...pyar ki bhasha sab samajh jate hain.....bhav purn rachna

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  8. बहुत प्‍यारी रचना

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