Friday, 5 April 2013

फूल और नारी !

फूल भी कभी कहेंगे क्या? उफ !!!!
तोड़ो मरोड़ो फेकों ये,
बिखर कर भी मुस्कराएंगे ,
तन्हा तन्हा धराशायी फूल भी
कभी कहेगे क्या उफ !!!

जीवन इनका मुस्कुराना,
खिलना हँसना और मिट जाना ,
खिलते मिटते फूल भी ,
कभी कहेंगे क्या उफ !!!!

अपने अधरों की लाली ,
देकर भी हैं मुसकाते फूल,
काँटों मे खिलकर भी हैं,
जगाते कोमल स्पर्श का अहसास,
क्या फूल भी रोते हैं ,
शायद हाँ, पर हम देख न पाते ,
ऐ फूल ! तू कुछ कुछ है
नारी के जैसा ,
"नूतन" दोनों की व्यथा एक,
क्या दोनों कभी कहेंगे उफ!!!!!!

10 comments:

  1. प्रभावशाली ,
    जारी रहें।

    शुभकामना !!!

    आर्यावर्त

    आर्यावर्त में समाचार और आलेख प्रकाशन के लिए सीधे संपादक को editor.aaryaavart@gmail.com पर मेल करें।

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  2. Bahut achi kavita hain.............

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  3. फूल और नारी की व्यथा के संग-संग नारी द्वारा किए गये शोषण के शिकार पुरुषों की व्यथा पर भी कोई कविता आप बनाएँ और हम उसे फिर से आपके ब्लॉग पर उसे पढ़ने आएँ...

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  4. बेहतरीन रचना,आभार.

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  5. आप बहुँत सुन्दर लिखती हैं .....www.sriramroy.blogspot.in भी देखे

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  6. नारी बिखर कर मुसकुराती नहीं ..... व्यथा को पी जाती है ....

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  7. गहन अनुभूतियों को सहजता से
    व्यक्त किया है आपने अपनी रचना में
    सार्थक रचना
    बधाई

    आग्रह है मेरे ब्लॉग jyoti-khare.blogspotin
    में भी सम्मलित हों ख़ुशी होगी

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  8. बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति! मेरी बधाई स्वीकारें।
    कृपया यहां पधार कर मुझे अनुग्रहीत करें-
    http://voice-brijesh.blogspot.com

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