Thursday, 3 October 2013

स्वच्छ गगन



स्वच्छ गगन
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स्वच्छ गगन मे
सुवर्ण सी धूप
भोर की किरण ने
आ जगाया ।
अर्ध उन्मीलित नेत्र
उनींदा  मानस
आलस्य पूरित
यह तन मन
पंछियों ने राग सुनाया ।
कामिनी सी कमनीय
सौंदर्य की प्रतिमा
नैसर्गिक छटा
फैली चहुं ओर
मुसकाते सुमन
झूमते  तरुवर
नव जोश जगाया ।
हुआ प्रफुल्लित ये मन
तोड़ कर मंथर बंधन
मानो  रोली कुमकुम
आ छिड़काया ।............. अन्नपूर्णा बाजपेई

7 comments:

  1. क्या बात .... पढ़ कर मन खुश हो गया .. बधाई

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    1. आ0 मीना जी आपका हार्दिक आभार ।

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  2. आपकी लिखी रचना की ये चन्द पंक्तियाँ.........
    स्वच्छ गगन मे
    सुवर्ण सी धूप
    भोर की किरण ने
    आ जगाया ।
    शनिवार 05/10/2013 को
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
    को आलोकित करेगी.... आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
    लिंक में आपका स्वागत है ..........धन्यवाद!

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    1. जी आदरणीया अवश्य , आपका हार्दिक आभार ।

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  3. सुन्दर प्रस्तुति ....!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (05-10-2013) को "माता का आशीष" (चर्चा मंच-1389) पर भी होगी!
    शारदेय नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. आदरणीय आपका हार्दिक आभार , अवश्य आपके इस ब्लॉग पर अपनी प्रविष्टि देख कर मुझे भी बेहद हर्ष होगा । सादर ।

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  4. सुन्दर रचना

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