Sunday, 28 July 2013

मेरे पिता


याद आ गया फिर
मुझे मेरा बचपन ,
पिता  की उंगली थामे,
नन्हें कदमों से नापना,
दूरियाँ, चलते चलते ,
वो थक कर बैठ जाना ,
झुक कर फिर पिता का ,
मुझको गोदी उठाना ,
चलते चलते मेहनत का,
पाठ वो धीरे से समझाना ।
 बच्चों पढ़ना है सुखदाई,
मिले इसी मे सभी भलाई,
पहले कुछ दिन कष्ट उठाना,
फिर सब दिन आनंद मनाना,
फिर आ गया याद,
 उनका ये  गुनगुनाना ,
सिर पर वो उनका हाथ,
भर देता है मुझमे नई,
उमंग,तरंग और स्फूर्ति ।
एक हूक सी उठती है ,
आज उनको न अपने,
पास पाती हूँ ,
साया सा महसूस करती हूँ,
 इर्द गिर्द वो शायद ,
मेरे पिता का साया है ,
 किसी कष्ट मे  उनको
अपने पास ही पाया है ,
खुशियों मे उनको दूर ,
मुसकुराते पाया है ।
 आज वो आँगन ,
एकदम खाली सा लगता है,
वो घर भी अब,
अजनबी सा लगता है ,
जिस के हर कोने मे ,
बसते थे मेरे पिता .....

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