Monday, 21 October 2013

कविता ------------------- मेरे ब्लॉग पर मेरी सौवीं पोस्ट आपकी सेवा मे ...........

मेरी नई कविता आपकी सेवा मे ।

क्या कहूँ ...............

आहत मन की व्यथा
कैसे सुनाऊँ.................
मन की व्याकुलता
अश्रु और व्याकुलता
साथी है परस्पर
आकुल होकर आँख भी
जब छलक जाती है
गरम अश्रुओं का लावा
कपोलों को झुलसा जाता है
न जाने कब कैसे ...................
पीर आँखों की राह
चल पड़ती है बिना कुछ कहे
आकुल मन बस यूं ही
तकता रह जाता है
भाव विहीन होकर भी
भाव पूर्ण बन जाता है जब
जिह्वा सुन्न हो जाती है तब
न जाने कब कैसे .........................
कुछ आरोपों की पोटली
फिर खुल गई
मन ने आरोपित किया
आँख को ,
फिर भर आई शायद
मन और आँख
साथी हैं परस्पर
क्या कहूँ .......................... अन्नपूर्णा बाजपेई



4 comments:

  1. many,many congratulations for sweet 100.....please watch my poetry kindly \
    www.sriramroy.blogspot.in

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    1. आपका धन्यवाद, स्वागत आपके आग्रह के लिए ।

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  2. आपकी यह पोस्ट आज के (२१ अक्टूबर, २०१३) ब्लॉग बुलेटिन - आज़ाद हिन्द फ़ौज को नमन पर प्रस्तुत की जा रही है | बधाई

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    1. आपका हार्दिक आभार तुषार जी ।

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