श्री राम चरित मानस मे माता सुमित्रा के उपदेश का बड़ा ही मार्मिक प्रसंग आया है जिसको गोस्वामी तुलसी दास जी ने इन पंक्तियों मे प्रस्तुत किया है –
रागु रोषु इरिषा मद मोहू । जनि सपनेहु इन्ह के बस होहू ॥
सकल प्रकार विकार बिहाई । मन क्रम बचन करेहू सेवकाई ॥
जेहि न रामु बन लहहि कलेसू । सुत सोइ करेहु इहइ उपदेसू ॥
तात्पर्य यह है कि श्री राम और सीता का वनगमन राष्ट्र उत्थान और मानव कल्याण के लिए हो रहा है , उनका यह अभियान तभी सफल होगा जब तुम राग द्वेष, ईर्ष्या , मद , मोह के वश मे सपने मे भी नहीं होगे और सब प्रकार के विकारों का परित्याग कर मन वचन और कर्म से उनकी सेवा करोगे , तुम वही करना जो राम तुमसे कहे।
इतनी अच्छी तरह से अपने पुत्र को उन्होने सेवा का मर्म समझा दिया था । पुत्र लक्ष्मण को माता सुमित्रा द्वारा दी गई शिक्षा समाज तथा राष्ट्र की सेवा करने वाले के लिए सच्ची शिक्षा है । अपने निजी स्वार्थ का त्याग कर परहित के लिए चिंतित होना और कुछ करने के लिए तत्पर होने की शिक्षा एक संस्कार वान माँ ही अपने बच्चे को दे सकती है । माता मदलसा ने अपने बच्चों को लोरी सुनते हुए ही सच्ची शिक्षा दे डाली थी ।
इस तरह से हम पौराणिक काल से ही यह देखते आए है बच्चे और माता का संबंध अलौकिक अद्वितीय है । सुसस्कृत माँ ही बच्चे को संस्कार वान बनाने मे सफल रहती है । माँ शब्द मे एक अनोखी प्यारी सी अनुभूति छिपी हुई है जो बच्चे जीवन मे नएपन संचार करती है ।