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Thursday, 4 April 2013

महिलाओं के लिए समानता का अधिकार

सरकार, महिला संगठनों के तथा विभिन्न स्तरो पर लोगों के सामूहिक और सतत प्रयासों का नतीजा है कि महिलाएं एक ताकत के रूप मे उभर रहीं है । महिलाओं के लिए समानता के अधिकारों की लड़ाई अभी भी जारी है किन्तु समानता का अधिकार अभी तक पूरी तरह मिल नहीं पाया है । पितृ सत्तात्मक और पुरुष प्रधान समाज मे महिलाएं अभी भी अपने अधिकार पाने की कोशिश मे लगीं हैं । महिलाओं के प्रति बढ़ती हिंसा उनकी नकारात्मक स्थिति का द्योतक है । यह हिंसा उनकी कोशिशों और समाज मे अपने स्थान की ओर बढ़ते कदम को रोकने और छिपा हुआ विरोध प्रदर्शन मात्र है । देखना यह है  कि कैसे शिक्षा , जागरूकता और क़ानूनों के जरिये महिलाओं कि सामाजिक स्थिति को मजबूत कर उनके प्रति हो रही  हर प्रकार की हिंसा  को कम किया जाय यह एक बड़ी चुनौती है ।

देश  की जन संख्या का स्वरूप बदल रहा है, लड़कियों की संख्या घटने से लिंग अनुपात गड़बड़ा गया है । शिक्षा के क्षेत्र मे उनकी स्थिति पहले से सुधरी है पर अभी भी वह पुरुषों के मुक़ाबले पीछे ही है । कई ऐसे मुद्दे हैं जिन पर ध्यान दिये जाने की जरूरत है :-

1) महिलाओं के पास राजनैतिक भागीदारी के मौके नहीं हैं ।

2) वैधानिक वरिष्ठता क्रम मे स्थान पीछे है ।
3) महिलाओं के लिए वित्तीय स्त्रोत काफी कम हैं या कहीं कहीं है भी नहीं।
4) घरेलू मामलों मे बराबरी का दर्जा भी कहीं कहीं न के बराबर है और कहीं पर बिलकुल नहीं है ।
5)  महिलाओं के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण भी काफी कमजोर है या रूखा है । 
6) स्वतन्त्रता से निर्णय लेने का हक़ महिलाओं को आज भी नहीं है ।
7) अधिकतर  देखने मे आता है की महिलाएं स्वयं ही संगठित नहीं है , इसलिए वे अलग थलग  पड़ जाती  है ।

महिलाएं आज भी पुरुषों पर ही निर्भर हैं चाहे वह पिता हो, भाई हो , पति हो , पुत्र हो । तो समानता अधिकार देने की पहल पुरुषों को ही करनी होगी । यह पिता से आरंभ हो सकता है  जैसा कि कानून भी बन चुका है , पिता अपनी संपत्ति का बराबर का हिस्सा अपनी सभी संतानों मे बाँट सकता है चाहे बेटा हो या बेटी ।  बेटी यदि चाहे तो ले न चाहे तो न ले । यहाँ यदि पिता स्वेच्छा से अपनी संपत्ति मे बराबर का हिस्सा अपनी पुत्री के नाम भी करता है जिस प्रकार बेटों के लिए करता है तो वह अपनी बेटी को एक मजबूती प्रदान कर पाएगा । दहेज मे दी जाने वाली रकम की जगह यदि बेटी के नाम कुछ संपत्ति का हिस्सा होगा तो बेटी इज्जत स्वयं ही बढ़ जाएगी और उसकी स्थिति भी मजबूत होगी। उसी प्रकार पति भी अपनी संपत्ति का चौथाई हिस्सा अपनी पत्नी के नाम कर सकता है
जिसको पत्नी अपनी स्वेच्छा से आगे चलकर बहू के नाम कर सकती है और इस तरह आगे वह बहू को मजबूती दे पाएगी । संपत्ति भी घूम फिर कर घर मे ही रहेगी जो कि स्त्री धन कहलाएगा जिस पर केवल स्त्री का ही हक़ होगा । जिस प्रकार पुरुष अपनी संपत्ति अपने बेटों के नाम करते है यही सिलसिला पीढ़ी दर पीढ़ी चलता आया है, उसी तरह महिलाएं अपनी संपत्ति का हिस्सा बेटों के नाम न कर बेटी और बहू के नाम करे ये असल मे स्त्री धन होगा ,इसमे कुछ बदलाव कर महिलाओं कि स्थिति को मजबूत बनाया जा सकता है । ये भी एक समानता का अधिकार ही होगा । 

यदि हम सच मे महिला सशक्तिकरण की बात करते है और उनका उत्थान चाहते है तो हमे कहीं से एक नई शुरुआत करनी ही होगी । ये तो हुई संपत्ति मे अधिकार  की  बात । अगला कदम जो कि पहला ही होना चाहिए, हमे शिक्षा का उठाना होगा और उन दूर दराज क्षेत्रों मे,  जहां अभी महिलाओं को घूँघट से बाहर निकलने की अनुमति नहीं है उन क्षेत्रों मे भी महिलाओं के लिए  शिक्षा को अनिवार्य करना होगा । इस प्रकरण मे हमारे एन जी ओ काफी सहायक हो सकते हैं । सरकार के द्वारा भी ऐसा नियम  लागू किया जाना चाहिए ।
सही मायनो मे हम तभी महिला सशक्तिकरण कर पाएंगे ।  

Saturday, 16 March 2013

महिलाएं और शिक्षा

आज की दुनिया मे शिक्षा और विकास का मुख्य संबंध है । विकास का सीधा संबंध महिलाओं से है । यदि महिलाए सुशिक्षित है तो वे सुशिक्षित समाज की रचना कर सकती है । दुनिया मे महिलाओं की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता । शहरों मे फिर भी महिलाएं पढ़ी लिखी होती है पर उन्हे सुशिक्षित नहीं कहा जा सकता । क्योंकि ये एक बहुत बड़ा शब्द  है और काफी अर्थपूर्ण भी है ।

 पठन पाठन से मस्तिष्क के सुप्त द्वार खुल जाते है और सोच भी सकारात्मक हो जाती है । किन्तु कहीं कहीं हम ये देखते हैं कि शिक्षा अहंकार का विषय बन जाती है । अपने से कम पढ़े व्यक्ति को हेय  दृष्टि से देखा जाता है । शिक्षा हमें विनम्रता सिखाती है न कि उड़ंदता । अतः शिक्षा जीवन का महत्तवपूर्ण अंग होना चाहिए ।
स्टेटस सिंबल नहीं ।

1975 मे महिला वर्ष के दौरान उन नीतियों और कार्यक्रमों पर विचार हुआ जो कि महिलाओं के विकास मे सहायक सिद्ध हो सकें।
वे अपनी भूमिका बेहतर तरीके से निभा सके इसके लिए उन्हे जरूरी प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए । इससे उनकी कार्यक्षमता का विकास होगा और उनका अपना जीवन स्तर भी सुधरेगा। संतानों को अच्छे संस्कार मिलेंगे , बेहतर जीवन शैली सीख पाएंगे  साथ ही मानसिक स्तर मे भी इजाफा होगा । घरों की खिट खिट  से ऊपर उठ कर कुछ अलग सोचने का नजरिया उत्पन्न होगा । परिवार व समाज मे उनका दोयम दर्जा तभी धीरे धीरे खत्म किया जा सकेगा, जब वे स्वयं शिक्षित होंगी ।
भारत मे आधी से ज्यादा आबादी महिलाएँ गांवो मे रहती है, जहां उन्हे बिना घूँघट घर से बाहर जाने की भी इजाजत नहीं है शिक्षा तो उनसे कोसों दूर है । हमे अपने सोचने के नजरिए को बहुत अधिक बदलने जरूरत है । उन महिलाओं को शिक्षित करने की जरूरत है जो ये कहतीं है कि - " हम क्या करेंगे पढ़ कर , बस बच्चे पढ़ जाने चाहिए ।" पर मै ये कहती हूँ कि - "जी नहीं बच्चे और आप दोनों ही पढे लिखे सुशिक्षित होने चाहिए तभी हम सुसंस्कृत समाज कि नींव रख पाएंगे ।

इसके लिए हमे महिलाओं को बराबरी का दर्जा देना होगा, उनकी नकारात्मक सोचों को सिरे से खारिज करना होगा ,उनकी आलोचनात्मक और सकारात्मक सोच को प्रोत्साहन देना होगा ताकि वे अपनी सामर्थ्य को पहचाने और सही फैसले ले सके । मै यहाँ उन तमाम महिलाओं का जिक्र कर रही हूँ जो आज भी शिक्षा से वंचित ही नहीं अनभिज्ञ भी है । इतनी तरक्की होने के बाद भी महिलाए अपनी भूमिका से , अपने अस्तित्त्व से अनजान हैं । 

हमे प्रयास कर उन पिछड़ी हुई महिलाओं को शिक्षित करना होगा। महिलाओं के लिए ये सोच कि - कौन सा इन्हे घर के बाहर जाकर नौकरी करनी है, को बदलना  ही होगा। एक सुशिक्षित महिला ही सुशिक्षित परिवार कि संरचना करती है । इस सोच को अधिक से अधिक प्रसार और प्रचार  की जरूरत है।  

   

Wednesday, 13 March 2013

महिलाओ से संबन्धित सामाजिक विधान

प्राचीन काल से ही हम ये देखते आए है कि महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया जाता रहा है और इन्हे हमारे पुरुष प्रधान समाज मे पुरुषों के हाथ के कठपुतली माना  गया  है। महिलाए अपनी निजी पहचान से वंचित है और इन्हे हमेशा पिता , पति या पुत्र की संपत्ति के रूप मे देखा गया है । इसे कभी भी जीवन साथी के रूप मे नहीं देखा जाता बल्कि इसे तो महज प्रयोग की जाने वाली वस्तु ही समझा जाता है । इसी लिए पुरुष प्रतिपक्षों से इसे घोर अपराध और अत्याचार का सामना करना पड़ता है। ऐसी हिंसा और शोषण से बचाने के लिए और इनके वैध अधिकारों के संवर्धन के लिए , भारत सरकार ने पहले विविध दंड संबंधी सिविल और श्रम कानून बनाए थे , जिन्हे सामाजिक विधान कहते है । इन सामाजिक विधानों के प्रावधानों को प्रभावी रूप से लागू करके सही मायने मे महिलाओं का आत्म विकास संभव है और सही मायनो मे भारत जैसे महान देश के नागरिक होने के नाते और महिला के रूप मे इनके लक्ष्यों और आकांक्षाओं को भली भांति पूरा किया जा सकता है । लेकिन , हमारे देश की तमाम महिलाएं ऐसे कानूनों के विविध प्रावधानों के प्रति जागरूक नहीं है , जिसकी वजह से वे अपने अधिकारो के प्रति ज़ोर देने की स्थिति मे भी नहीं हैं । इसके लिए महिला या पुरुष सामाजिक चेतना को जागृत करने की और महिलाओं को सशक्त करने के मुहिमो को बढ़ावा देने की जरूरत है ताकि उनका आत्मविश्वास हो और पुरुषों की भागीदारी मे इस राष्ट्र के विकास मे अधिकाधिक योगदान हो । 

पंडित नेहरू जी ने इस बात पर ज़ोर दिया था की " विधान अकेले इन गहरी जड़दार   सामाजिक समस्याओं को हल नहीं कर सकता । इन्हे खत्म करने के लिए हमे अलग अलग नजरिए से देखना होगा जिसमे कानून की भूमिका अनिवार्य एवं आवश्यक रहेगी जिससे मौजूदा विकल्प पर ज़ोर दिया जा सके और जिसके पीछे एक ठोस शैक्षिक कारण और कानूनी स्वीकृति एवं सम्मति हो जो लक्ष्य को साकार करने मे सार्वजनिक राय बनाने मे मददगार हो ।"

महिलाओं के संवैधानिक अधिकार :- भारतीय संविधान वर्ष 1950 मे अस्तित्व मे आया । इसने सभी को सामाजिक , राजनैतिक और आर्थिक न्याय देने मे संविधान सभा के  निर्णय से अवगत कराया गया । जिसके बाद महिलाओं को सुरक्षित और उनकी स्थिति को बेहतर बनाने के लिए संविधान ने विविध प्रावधान बनाए । 

संविधान दो तरीकों से सामाजिक न्याय पर प्रभाव डालता है । 
1) महिला / पुरुषों को ( अनुच्छेद (14)से (32) कुछ विशेष अधिकार देता है। जिन्हे अदालत द्वारा लागू किया जा सकता है । 

2) संविधान कुछ विशेष सिद्धांतों को लागू करने के लिए राज्य को निर्देश देता है जिन्हे राज्य नीति के निर्देश सिद्धान्त कहते है । न्यायालयों की भांति इन्हे लागू करने की जरूरत नहीं पड़ती , बल्कि देश के शासन मे इन्हे मौलिक घोषित किया जाता है । इसलिए नैतिक एवं राजनीतिक मूल्य इनमे निहित होते है ।
निस्संदेह मौलिक अधिकार महिला और पुरुष दोनों के लिए है , लेकिन समानता का अधिकार जो कि संविधान द्वारा सुनिश्चित मौलिक अधिकारों मे से एक हैं , महिलाओं के लिए विशेष मायने रखता है ।


 संविधान के अनुच्छेद 15 (3) मे विशेष रूप से व्यक्त है कि महिलाओं के कल्याण के मद्दे नजर विशेष प्रावधान बनाने की अनुमति  राज्य को  प्राप्त है ।

संविधान के अनुच्छेद 51 क ( च )मे व्यक्त है कि महिलाओं की प्रतिष्ठा को ठेस पंहुचाने वाले व्यवहारों को त्यागना भारत के हर एक नागरिक का कर्तव्य है ।

और भी कई कानून जैसे :-

दहेज  अपराध संबंधी कानून

स्त्री अशिष्ट रूपण ( चित्रण ) संबंधी कानून

बलात्कार संबंधी कानून

अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम 

1986 हिन्दू , मुस्लिम ,क्रिश्चियन विवाहों से संबन्धित कानून

ये सभी कानून बनाए गए थे महिलाओं की सुरक्षा के लिए ताकि वे आवश्यकता पड़ने पर इसका लाभ उठा सकें । परंतु जानकारी के अभाव मे उन्हे लाभ नहीं मिल पाता है आज जरूरत है उन्हे उनकी सुरक्षा संबंधी कानूनों से पूरी तरह अवगत कराया जाए ।
          


          -  कुछ अंश सामाजिक संविधान पुस्तक से साभार