“अतुकांत" कविता
जीव है पक्षी की अनुहार ,
उड़त नहि लागे नेक अपार ।
एक द्वार की कौन चलावे ,
लागे हैं नौ द्वार ।
किस द्वारे से किस द्वारे जावे,
कैसा ये पाखंड दिखावे ।
कोउ न जानन हार,
नित यहि मे भरमावे ।
गढ़ लइ कोट अटारी सुंदर ,
कीन्ही यहाँ तैयार ।
षटरस व्यंजन नित्य खवावे,
करि सोरह सिंगार ।
नित नए करतब दिखलावे ,
भूल समय का प्यार ।